Sunday, March 8, 2015

क्या मनरेगा किसानों की मदद करेगा ?

करोडो रुपये खर्च करके अगर मनरेगा के मजदुरों द्वारा खड्डे ही खुदवाने है तो क्यू ना खेतों मे वही खड्डे थोडे तरीकेसे खोद  कर उन्हे कंपोस्ट खाद के खड्डे बनाये ?और सिर्फ खड्डे हि क्यू  अगर हम पुरे मनरेगा को खेती के काम मे जुटानेका कोई हाय टेक तरीका,   मसलन कम्पुटर और खेती के आधुनिक औजारोंका इस्तेमाल कर सकते है इस तरह किसानों का बहोत सारा पैसा और श्रम बच जायेगा और मनरेगा का सही उपयोग होगा यांनी मनरेगा एक उत्पादक उपक्रम बनेगा .
 इसकी रूपरेखा कुछ  इस तरह हो  सकती है

१ )राष्ट्रीय क़म्पोस्ट खाद निर्माण   -युरिया जैसे तमाम रासायनिक उर्वरकोंके इस्तेमाल से खेती जमीन की  उपजावूता  नष्ट हो रही है ऐसे खेतो मे बीना  रासायनिक उर्वरकोंके अच्छी फसल नही आ सकती,  उतरोतर क्षारता बढ कर जमीन बंजर हो जाती है . और तो और   रासायनिक उर्वरक बहोत ही महंगे होते है ,इन कारणों  से  एक तो फसल बहोत कम आती है और दुसरी तरफ से कृत्रिम खाद  और बीज बियानो के उचे दामो के कारण फसलो का उत्पादन मुल्य इतना बढ जाता  है की खेती करना और उपजीविका चलाना अश्यक्य प्राय हो जाता है ,ऐसे मे आजकल   मनरेगा द्वारा  मजदुरोंको खेती से दूर करने से उसकी मदद करणे वाला आखरी आधार भी चला गया है और इसी कारण से मजदुरिके दाम भी बढ गये है,  अपना  और खेती का अस्तित्व बचा ने के लिये  किसानों को  कर्जे लेने  पडते है .जाहीर है  के ऐसे मे  किसान वह  कर्जा उतार नही सकता,इस चक्रव्यूह मे फसे हुये किसानोंको ,आत्महत्या की मजबुरी से बाहर निकालने के लिये  ,प्रयास करणे कि शुरुवात राष्ट्रीय  क़म्पोस्ट खाद निर्माण से की जा सकती  है यह बहोत हि कारगर उपाय है बडे पैमाने पर क़म्पोस्ट खाद निर्माण  के लिये खेतों मे मनरेगा  द्वारा उपयुक्त खड्डे बनाने पर किसान सेंद्रिय खाद बना सकते है ,जिसके इस्तेमाल से   १) रासायनिक उर्वरकों का खर्चा या तो बच जायेगा या धीरे धीरे उसके  कम इस्तेमाल से खर्चा भी  कम होता जायेगा     २)जमीन कि उपज क्षमता बढ कर फसल भी अच्छी(जादा ) आयेगी और
इस तरह मनरेगा और राष्ट्रीय  क़म्पोस्ट खाद निर्माण से किसानों को बहोत बडी राहत  मिल जायेगी  इस नाविन्य पूर्ण सोच को हम आगे बढायेंगे तो चमत्कार हो सकता है !
    क्यो ना  पूरी  मनरेगा  या फिर उसका  जादातर मानव संसाधन कृषी क्षेत्र पर लगाये ?
कुछ इस तरह -
१)हर गावं के किसानो और उनकी खेती,नियोजित फसल और उसके लिये श्रम कार्य कि सूची बनाये,और कृषी कार्य के लिये तारीख तथा समय तय कर उसकी जानकारी किसानोंको दे . इसके लिये काम्पुटर और इंटर नेट का इस्तेमाल करे ,आधार कार्ड भी बहुत हि उपयुक्त साबित होगा .

२)नियोजित तरीके से मनरेगा,मजदुरों को सरकारी वाहनो द्वारा एक क्षेत्र से दुसरे क्षेत्रो के खेतो तक ले जाये और उनके द्वारा ट्रकटर आदी का उपयोग कर के कृषी कार्य कर ले

३) मजदुरो द्वारा  खेतो मे छोटे छोटे कृत्रिम  तालाब बनाये जाये ,

४)बिंदु सिंचाइ का साहित्य   सबशिडी पर मुहया कराये ,कुछ मजदूर और किसानो को आधुनिक यंत्र इस्तेमाल करणे का प्रशिक्षण दे कर ,काम मे लगाये


३)सरकार स्वयं   सिड प्रोडक्शन करे और  बढाये ,किसानो को कम दामो मे बीज उपलब्ध करे या मुफ्त मे  दे . ४)किसी क्षेत्र विशेष मे कीस तरह कि फसल का उत्पादन लेना है वह भी तय करणे का अधिकार इस योजना मे सहभागी होनेवाले किसान सरकार को आपने आप हि देंगे(मुफ्त के  मजूर जो मिलेंगे!)इससे  फसल नियोजन  का केंद्रीकरण  और सरकारी करन  किया जा सकता है,
मनरेगा का इस दिशा मे  प्रयोग करना ,बहोत ही उत्पादक साबित होगा और देश को  सही मायने मे सुजलाम सुफलाम बना सकता है यह कदम ,जिसे  पसंद आया ,कृपया कॉपी करे और प्रधान मंत्री तथा मानव संसाधन मंत्री  को भेजे ,इससे हम किसानो को आत्महत्या करणे से परावृत्त कर सकते है हमारी  खेती ,किसान ,गाव , और पर्यावरण  को भी  बचा सकते है .
     देश के लिये  यह नेक काम  जलद से जल्द करना बहुत जरुरी है .    
http://satyatru.blogspot.in/2015/03/blog-post.html.

क्या मनरेगा किसानों की मदद करेगा ?

क्या मनरेगा किसानों की मदद करेगा ? 

करोडो रुपये खर्च करके अगर मनरेगा के मजदुरों द्वारा खड्डे ही खुदवाने है तो क्यू ना खेतों मे वही खड्डे थोडे तरीकेसे खोद  कर उन्हे कंपोस्ट खाद के खड्डे बनाये ?और सिर्फ खड्डे हि क्यू  अगर हम पुरे मनरेगा को खेती के काम मे जुटानेका कोई हाय टेक तरीका,   मसलन कम्पुटर और खेती के आधुनिक औजारोंका इस्तेमाल कर सकते है इस तरह किसानों का बहोत सारा पैसा और श्रम बच जायेगा और मनरेगा का सही उपयोग होगा यांनी मनरेगा एक उत्पादक उपक्रम बनेगा .
 इसकी रूपरेखा कुछ  इस तरह हो  सकती है 
१ )राष्ट्रीय क़म्पोस्ट खाद निर्माण   -युरिया जैसे तमाम रासायनिक उर्वरकोंके इस्तेमाल से खेती जमीन की  उपजावूता  नष्ट हो रही है ऐसे खेतो मे बीना  रासायनिक उर्वरकोंके अच्छी फसल नही आ सकती,  उतरोतर क्षारता बढ कर जमीन बंजर हो जाती है . और तो और   रासायनिक उर्वरक बहोत ही महंगे होते है ,इन कारणों  से  एक तो फसल बहोत कम आती है और दुसरी तरफ से कृत्रिम खाद  और बीज बियानो के उचे दामो के कारण फसलो का उत्पादन मुल्य इतना बढ जाता  है की खेती करना और उपजीविका चलाना अश्यक्य प्राय हो जाता है ,ऐसे मे आजकल   मनरेगा द्वारा  मजदुरोंको खेती से दूर करने से उसकी मदद करणे वाला आखरी आधार भी चला गया है और इसी कारण से मजदुरिके दाम भी बढ गये है,  अपना  और खेती का अस्तित्व बचा ने के लिये  किसानों को  कर्जे लेने  पडते है .जाहीर है  के ऐसे मे  किसान वह  कर्जा उतार नही सकता,इस चक्रव्यूह मे फसे हुये किसानोंको ,आत्महत्या की मजबुरी से बाहर निकालने के लिये  ,प्रयास करणे कि शुरुवात राष्ट्रीय  क़म्पोस्ट खाद निर्माण से की जा सकती  है यह बहोत हि कारगर उपाय है बडे पैमाने पर क़म्पोस्ट खाद निर्माण  के लिये खेतों मे मनरेगा  द्वारा उपयुक्त खड्डे बनाने पर किसान सेंद्रिय खाद बना सकते है ,जिसके इस्तेमाल से   १) रासायनिक उर्वरकों का खर्चा या तो बच जायेगा या धीरे धीरे उसके  कम इस्तेमाल से खर्चा भी  कम होता जायेगा     २)जमीन कि उपज क्षमता बढ कर फसल भी अच्छी(जादा ) आयेगी और  
इस तरह मनरेगा और राष्ट्रीय  क़म्पोस्ट खाद निर्माण से किसानों को बहोत बडी राहत  मिल जायेगी  इस नाविन्य पूर्ण सोच को हम आगे बढायेंगे तो चमत्कार हो सकता है ! 
    क्यो ना  पूरी  मनरेगा  या फिर उसका  जादातर मानव संसाधन कृषी क्षेत्र पर लगाये ?  
कुछ इस तरह -
१)हर गावं के किसानो और उनकी खेती,नियोजित फसल और उसके लिये श्रम कार्य कि सूची बनाये,और कृषी कार्य के लिये तारीख तथा समय तय कर उसकी जानकारी किसानोंको दे . इसके लिये काम्पुटर और इंटर नेट का इस्तेमाल करे ,आधार कार्ड भी बहुत हि उपयुक्त साबित होगा .  

२)नियोजित तरीके से मनरेगा,मजदुरों को सरकारी वाहनो द्वारा एक क्षेत्र से दुसरे क्षेत्रो के खेतो तक ले जाये और उनके द्वारा ट्रकटर आदी का उपयोग कर के कृषी कार्य कर ले 

३) मजदुरो द्वारा  खेतो मे छोटे छोटे कृत्रिम  तालाब बनाये जाये , 

४)बिंदु सिंचाइ का साहित्य   सबशिडी पर मुहया कराये ,कुछ मजदूर और किसानो को आधुनिक यंत्र इस्तेमाल करणे का प्रशिक्षण दे कर ,काम मे लगाये   
३)सरकार स्वयं   सिड प्रोडक्शन करे और  बढाये ,किसानो को कम दामो मे बीज उपलब्ध करे या मुफ्त मे  दे . ४)किसी क्षेत्र विशेष मे कीस तरह कि फसल का उत्पादन लेना है वह भी तय करणे का अधिकार इस योजना मे सहभागी होनेवाले किसान सरकार को आपने आप हि देंगे(मुफ्त के  मजूर जो मिलेंगे!)इससे  फसल नियोजन  का केंद्रीकरण  और सरकारी करन  किया जा सकता है,
मनरेगा का इस दिशा मे  प्रयोग करना ,बहोत ही उत्पादक साबित होगा और देश को  सही मायने मे सुजलाम सुफलाम बना सकता है यह कदम ,जिसे  पसंद आया ,कृपया कॉपी करे और प्रधान मंत्री तथा मानव संसाधन मंत्री  को भेजे ,इससे हम किसानो को आत्महत्या करणे से परावृत्त कर सकते है हमारी  खेती ,किसान ,गाव , और पर्यावरण  को भी  बचा सकते है . 
     देश के लिये  यह नेक काम  जलद से जल्द करना बहुत जरुरी है .      



     

Monday, July 21, 2014

भारत मे कृषी शिक्षा अनिवार्य हो -राजा रघुपती

   भारत मे कृषी शिक्षा अनिवार्य  हो लेखक -राजा रघुपती
   ''जिस तरह दुनिया के  कुछ देशो मे सैनिकी शिक्षा (मिलिटरी एज्युकेशन)अनिवार्य  होती है उसी तरह भारत में सबके लिए कृषी शिक्षा अनिवार्य हो '' --राजा रघुपती  


आजकल  खेतो में काम करने के लिए मजदूर नहीं  मिलते ,लेकिन शहरो में उच्च शिक्षित  बेरोजगारो की भीड़ बढ़ती ही जा रही हैं जो  BA ,MA  है उनमे से कई लोग किसी छोटे मोटे होटल मे वेटर का काम या सेल्स मनशिप  या फिर  अन्य २ ,३ हजार महीने वाली नौकरी कर करते है ,देखा जाए तो ,ये लोग पदवीधर होते हुए भी आखिर किसी ना किसी प्रकार की मजदूरी ही कर रहे है ,लेकिन ऐसे काम को कोई आंग्रेजी नाम जैसे सेल्स एक्सिक्यूटिव ,फिल्ड ऑफिसर यहा तक के मैनेजर भी कहलाकर उसमे झूठा   समाधान मानते है ,कुछ लोग तो पूरी जिंदगी शहर  के किसी गट्टर  के किनारे जिंदगी बसर करते है लोकल गाडियों की भीड़ में  हर रोज मरणांतक पीड़ा सहते है लेकिन इस घुटन भरी जिंदगी से कभी कभार बाहर आकर जब अपने गांव एक दो दिन के लिए जाते है तो वहा के  खुला आकाश,निर्मल वायु ,बडासा घर उससे भी बड़ा आँगन  ऐसे वैभव  का मालिक; जो किसान ,जो इनकी तुलना में राजा की तरह जिंदगी बसर करता है उसके पास शहर की चक्का चौंध और उसमे अपनी काल्पनिक शानोशौक़त का ऐसा वर्णन करते है मानो इनके सामने वह किसान भिकारी है। फिर उस किसान के मन में भी यह बात जाकर बसती है की गांव में कुछ भी नहीं है, तरकी करनी है तो शहर जाना चाहिए लेकिन वह खुद नहीं जा सकता लेकिन इस मानसिकता की वजह से उसकी अगली पीढ़ी खेती नहीं कर सकती।  वह लोग अपनी खेती  किसी मोटी तनखा वाले बाबू या फिर छटे  या सातवे वेतन आयोग का भारी भरकम बकाया पानेवाले  प्रोफ़ेसर  को   बेच देता है   और उसमे से मिले हुए लाखो रुपये ले दे कर सरकारी नौकरी खरीद लेता है।  इस तरह भारत की विरासत और बलस्थान यानी की खेती तेजी से नष्ट हो रही है। यह सब अंग्रेजो के बनाये हुए शिक्षा पद्धति का परिणाम है ,जिससे शहरीकरण बढता है ,अंग्रेजो के देश में खेती नहीं है ,इस लिए उन्होंने ऐसा किया  BA ,MA करने में १० साल अटकाकर लोगो को निकम्मा  और लाचार कर दिया।

छोडो , अंग्रेज तो गए साठ साल हो गए ,उन्होंने जाने अनजाने में कुछ अच्छा भी किया ,अब सरकार भी बदल गयी ,क्यों ना,युवा शक्ति  को   सही दिशा में मोड़ने के लिए शिक्षा पध्दती बदली जाय ताकि खेती में काम करने वालो की  प्रतिष्ठा और आमदनी किसी बाबू से कम न हो. और इसका मूल सिद्धांत यह होगा --

''जिस तरह दुनिया के  कुछ देशो मे सैनिकी शिक्षा (मिलिटरी एजुकेशन)अनिवार्य  होती है उसी तरह भारत में सबके लिए कृषी शिक्षा अनिवार्य हो ''
१.  लेकिन फिलहाल सिर्फ आर्ट फैकल्टी के लिए ११ वि से लेकर MA  तक मौजूदा विषयों के साथ साथ और एक  कंपल्सरी  सब्जेक्ट-'' आधुनिक खेती''   जिसमे ७० मार्क का प्रैक्टिकल और ३० मार्क्स की थियरी हो
२. प्रैक्टिकल के लिए महाविद्यालयों के मैदानों में ग्रीन हाउस तथा अन्य एग्रीकल्चरल वर्क शॉप्स और लॅब  बने

 
3)हर युनिव्हर्सिटी का syllabus उस प्रदेश में जिस तरह की खेती हो सकती है उसके अनुसार  हो
4 . सरकारी एग्रीकल्चर कंपनिया स्थापित हो ,जो अपने कर्मचारियों द्वारा आधुनिक खेती करे ,जिसमे उक्त प्रशिक्षित छात्रोंको काम मिले 
इस पध्दति के फायदे 
१.भारत की युवा शक्ति को नयी दिशा मिलेगी १० साल पढ़ाई के बाद नौकरी पाने के लिए समय  शक्ति और पूंजी बरबाद करने के बजाय युवक युवतियो में किसान प्रवृति निर्माण होने के कारण वे आधुनिक खेती के तरफ बढ़ेंगे 
2 . सरकारी एग्रीकल्चर कंपनिया स्थापित होते ही ,बड़े प्रगतिशील किसान तथा कार्पोरेट कंपनिया भी इस उद्योग में उत्तर सकती है ,क्यू की महाविद्यालयो द्वारा  प्रशिक्षित मानव  संसाधन की कोई कमी नहीं होगी   

३। खेती और जंगल भी बच जायेंगे प्रदुषण कम होगा निर्मल जल वायु और हरी भरी धरती से स्वास्थ और खुशहाली  बढ़ेगी

                                                
क्या करना होगा? शिक्षा व्यवस्थामे इस तरह का परिवर्तन लाने के लिए इस ब्लॉग की  लाखो कॉपीया -दुनिया के सबसे अच्छे प्रधानमन्त्री,देशहित  में तुरंत निर्णय लेने में जिनका कोई जवाब नहीं ऐसे- 
आ.श्री नरेंद्र भाई मोदीजी 
                                    तथा मानव संसाधन मंत्री - 
                        आ. श्रीमती स्मृति ईरानीजी                                                  तक पहुंचे-
                 भारत मे कृषी शिक्षा अनिवार्य  हो                              राजा रघुपती 
मुंबई 
  

Saturday, November 3, 2012

अंग्रेजी माध्यम: एक भ्रम

अंग्रेजी माध्यम: एक भ्रम  
   बहुमुखी व्यक्तित्व विकास नही हो सकता अंग्रेजी मध्यम से पढ ने वालों का .
    कारण ,
    १.मस्तिष्क विकास  होता है ,उम्र के ११ साल तक 
    २.बच्चे  ज्यादा चौकस,होते है और ज्यादा सवाल पु छते है  ,इसी उम्र  तक 
    ३.सवाल पु छ ने को ,वैसे भी  डर लगता है,इंग्लिश मे और भी मुश्कील बन जाता है .
    ४.आदत पड जाती है ,चुपचाप सुनानेकी ,और तोते  कि तऱ्ह बगैर समझे   रटने की.फिर जीवन को भी समझ नही सकते .
   ५.जो बहुत बुद्धिमान होते है ,उनको कोई फरक नही पढता,लेकीन करीब ७५% जो सामान्य होते है ,जहा अंग्रेजी वाले जीवनभर गोते  खाते रहते ही,वही मातृ भाषा वाले ,जीवन के किसी ना किसी क्षेत्र मे आखीरकर यशस्वी हो हि जाते है
   ६. ना  अंग्रेजी आती है ,ना सशक्त देशी भाषा ,ना व्यवहार  ज्ञान,बहोत होता है नुकसान.
   ७.अंग्रेजी आने से व्यक्ती बुद्धिमान बन जाता है ,बहोत बडा भ्रम है .
    ८.अंग्रेजी बोलणे के लिये पुरी शिक्षा अंग्रेजी मे लेना जरुरी नही   है .
   ९. फ्रेंच ,रशियन ,जर्मन ,अरेबिक आदी भाषा ये  भी साल दो साल मे शीखकर विदेश जाणे वाले बहोत लोग है .
    बहनो और भाई यो  ,अगर आप को फिर भी डर लगता है ,तो बच्चों को सेमी इंग्लिश(semi English) मे डालो.मातृभाषा, जैसे मां  का दुध है ,बच्चा  हर क्षेत्र मे बलवान हो जायेगा .
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Friday, August 10, 2012

देश में :पेट दर्द की बीमारी

मोदी से नितीश :पेट दर्द की बीमारी 
जी हा भारत में  यह बीमारी बहोत आम है .जब भी कोई अपने बलबूते पर आगे आता है तो तमाम प्रस्थापित लोगो की नींद उड़ने   लगती है .क्यों की जब बलवान व्यक्ति सत्ता में आती है तो नकली नेतावो का  कोई महत्व नहीं रहता , और  चिलर लोग जो अपनी जाती, किस की शिफारीश ,या  किसीका विश्वास घात करके,कही न कही उच्च  पद पर बैठे है ,यानी जो लोग सोनेका पालिश लगाए हुए पीतल जैसे है ,वो खुद सता में नहीं आ सकते लेकिन किंग मेकर बनकर  अप्रत्यक्ष रूप में सत्ता में भागीदार बन सकते है .इसीलिए मोदी जैसे बलवान को साथ देने के बजाय वे नितीश में उनका पर्याय  धूड़ते   है.क्यों की मोदी जैसा  स्वयंभू नेता सत्ता पाता  है तो वह  ,कमजोर और नकली लोगो के इशारों पर काम नहीं कर सकता ,मतलब ऐसे लोगो का कोई महत्व नहीं रहेगा .कमजोर व्यक्ति  को सता में बिठा कर ,सत्ता की डोर अपने हात में रखना ,यही इस देश की राजनिती का प्रमुख लक्षण है .
इसी के तहत  देश के पहले प्रधान मंत्री से लेकर आज तक की राजनीती चला रही है . 

Wednesday, November 9, 2011

आरक्षण और करप्शन दोनों का परिणाम =कमजोर देश

आरक्षण और करप्शन दोनों का परिणाम =कमजोर देश
    कुछ दिन  पहले परराष्ट्र  मंत्री कृष्णा ने सयुक्त राष्ट्र सभा में पोर्तुगाल के मंत्री का भाषण पढ़ डाला,जबकि उन्हें भारत   का पक्ष दुनिया के सामने रखने के लिए भेजा गया था .उन्होंने यह साबित कर दिया की वह उस मंत्री  पद के काबिल नहीं है .दुनिया को भी यह पता चल गया की भारत में गुणवत्ता के आधार पर पद नहीं भरे जाते और यही बात सच है.हमारे यहाँ या तो करप्शन द्वारा यानि पैसा लेकर या शिफारिस से बड़े और छोटे पदों पर नियुक्ति की जाती है या फिर आरक्षण द्वारा बुद्धिमान और काबिल लोगो को हटाकर कर्मचारी और राजकर्ता  की भी भरती की जाती है  दोनों प्रकारो में देश को चलाने के लिए जो  लायक है ऐसे लोगो को किनारे किया जाता है 
  हाल ही में पता चला है की काबिल व्यक्ति को हटाकर अपने शिफारिश के टटू की भरती करने की प्रक्रिया की नीव हमारे पूज्य बापूजी ने रखी थी उन्होंने वल्लभभाई पटेल  को बहुसंख्य लोगों द्वारा चुनने के बावजूद प्रधान मंत्री पद के लिए जवाहर लाल नेहेरू की शिफारिस करते हुवे उन्हें   सिहासन पर बिठाया .लोग हमेशा महात्मा के नक़्शे कदम पर चलते है आगे क्या होता गया  सब जानते है .क्या ये देश इसी वजह से कमजोर नहीं हुवा  है?     पाकिस्तान ने कई बार हमला किया .आधे से ज्यादा कश्मीर पर कब्जा कर लिया ,चीन ने तिबेट तो हटिया लिया ही ऊपर से १०० वर्ग की.मी. जमीं भी कब्जे में कर ली है  अब तो वह अरुणा चल प्रदेश पर भी अपना दावा  कर रहा है .अगर यह देश इसीतरह नालायक लोगो के हात में रहे गा तो एक दिन फिर से गुलामी/परतंत्र में जाने का डर   है क्यों के अमेरिका और चीन में आरक्षण नहीं है और करप्शन  बहोत कम  है .ऐसे बलवान शत्रु नालायक लोगो द्वारा चलाये जारहे देश को सहज हाराने  का  साहस करने के बारेमे  सोच सकते है या नही?.
 कोई माने या ना माने बाबा का आरक्षण भी देश को कमजोर करने में  भूमिका कर रहा है जरा सोचिये  जब हमें अपने सोसाइटी या फार्म के लिए वाचमन रखना हो तो क्या हम ज्यादा से ज्यादा काबिल व्यक्ति का चlयन नहीं करते ?या  इसके बजाय उसकी गरीबी या आरक्षण प्रवर्ग देखते है ?कोई आरक्षण समर्थक कम काबिलियत वाले नोकर को निजी काम के लिए नहीं रखेगा अगर उसे उतनेही पैसो में ज्यादा होशियार ,हटाकटा नौकर मिले,या फिर क्या ऐसा हो सकता है की आप बीमार है और इलाज के लिए आप किसी ..
कम काबिल डॉक्टर के पास इस लिए जा रहे है के वह  आरक्षित प्रवर्ग का है? जब के आप के सामने ही एक काबिल डॉक्टर है ,जिसकी जाती मालूम नही है.जी नही ऐसा नही हो सकता .   
    खुद   के लिए हम अछि से अछी  सेवा और सेवक का ही चयन करते है फिर देश के लिए ऐसा क्यों?   सरकारी   नौकर के काबिलियत के बजाय उसकी जाती   क्यो देखते है ?देश कमजोर हुवा तो चलेगा?    
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